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एकान्त का सूनापन - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
विजय निकोर ठिठुरता गहन सन्नाटा भीतर, अति निज कमरों का एकान्त अब और सुनसान - वर्ष पर वर्ष बीत जाते हैं पर जानें क्यूँ कोई दिन एक वत्सर हों जैसे, बीताते