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वत्स ! क्या अब तुम वह नहीं, जो पहले थे ! - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
वत्स ! क्या अब तुम वह नहीं, जो पहले थे? निर्गुण की पहेली, अहसास की अठखेली; गुणों का धीरे धीरे प्रविष्ट होना सुमिष्ट लगना, पल पल की चादर में निखर सज सँवर