pravakta.com
आज आया लाँघता मैं ! आज की अभी की - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
गोपाल बघेल ‘मधु’ आज आया लाँघता मैं, ज़िन्दगी में कुछ दीवारें ; खोलता मैं कुछ किबाड़ें, झाँकता जग की कगारें ! मिले थे कितने नज़ारे, पास कितने आए द्वारे;