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ज्वार उठाना होगा, मस्तक कटाना होगा - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
कवि आलोक पाण्डेय समर की बेला है वीरों अब संधान करो, शत्रु को मर्दन करने को, त्वरित अनुसंधान करो | मातृभू की खातिर फिर लहू बहाना होगा; ज्वार उठाना होगा,