pravakta.com
देश पर कम होता ऋण भार - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
डॉ. मयंक चतुर्वेदी ऋण को विकास के लिए जितना अधिक अपरिहार्य माना गया है, उतना ही लगातार इससे डूबे रहने को जनमानस में घोर विपत्‍ति‍कारक स्‍वीकार्य किया गया