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पल्लवित प्रफुल्लित बगिया ! - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
रचनाकार: गोपाल बघेल ‘मधु’ (मधुगीति १८०७१६ स) पल्लवित प्रफुल्लित बगिया, प्रभु की सदा ही रहती; पुष्प कंटक प्रचुर होते, दनुजता मनुजता होती !