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रक्तिम - भँवर - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
रक्तिम - भँवर आलोक पाण्डेय भर - भर आँसू से आँखें , क्या सोच रहे मधुप ह्रदय स्पर्श , क्या सोच रहे काँटों का काठिन्य , या किसी स्फूट कलियों का हर्ष ? मन्द