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प्रो. मधुसूदन की कविता : खंडहर शिवाला - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
प्रवेश: एक घना निबिड़ अरण्य। जलाशय के किनारे, प्राचीन खंडहर शिवाला विलुप्तसा। पगडंडी परभी पेड पौधे। मिट चुकी पगडंडी। बरसों से कोई यात्री ही नहीं।