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कविता : फूलों-सी हँसती रहो - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
कई दिनों से तुम टूटी कलम से लिखी कविता-सी बिखरी- बिखरी, स्वयं में टूटी, स्वयं में सिमटी, अनासक्‍त अलग-अलग-सी रहती हो कि जैसे हर साँझ की बहुत पुरानी