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हमारा लोकतंत्र और बेचारे गधे - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
प्रभुनाथ शुक्ल सुबह सो कर उठा तो मेरी नज़र अचानक टी टेबल पर पड़े अख़बार के ताजे अंक पर जा टिकी । जिस पर मोटे - मोटे अक्षरों में लिखा था " गधों की हड़ताल"