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ज्वालामुखी - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
हर आदमी आज यहाँ, ज्वालामुखी बन चुका है। क्रोध कुंठा ईर्ष्या की आग भीतर ही भीतर सुलग रही है। कोई फटने को तैयार बैठा हैं, कोई आग को दबाये बैठा है,