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जिया जले, जाँ जले ! - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
देवेंद्रराज सुथार अब तो न दिन को चैन आता है और न ही रात को नींद आती है। इस आलम में कुछ नहीं भाता है और न ही कोई ख्याल आता है। जिया जलता है। जाँ जलती है।