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जवानी जो आई बचपन की हुड़दंगी चली गई - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
रूपेश जैन 'राहत जवानी जो आई बचपन की हुड़दंगी चली गई दफ़्तरी से हुए वाबस्ता तो आवारगी चली गई शौक़ अब रहे न कोई ज़िंदगी की भागदौड़ में दुनियाँ के दस्तूर में