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महँगाई का दंश - पुनीता सिंह - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
बरसात आती है या महँगाई बरसती है बाजार मे हर चीज बहुत मंहगी है। बाहर बाढ जैसा नज़ारा है इधर घर की नाव डूबने को है। सब्ज़ियों के भाव बादल जैसे गरज रहे है हर