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है ज्ञान औ अज्ञान में  ! - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
(मधुगीति १८०८२७ ब) रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’ है ज्ञान औ अज्ञान में, बस भेद एक अनुभूति का; एक फ़ासला है कर्म का, अनुभूत भव की द्रष्टि का !