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हिंदी ग़ज़ल - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
शहर तो है नींद से जागा। मुंडेरों पर बोले कागा।। दिनचर्या चालू होते ही, वो दफ्तर को सरपट भागा। होने लगी मुनादी गर तो, पीट रहा है डुग्गी डागा। आपस में अनबन