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घर-घर शौचालय पर बहस ज़रूरी - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
समझने की बात है कि एकल होते परिवारों के कारण मवेशियों की घटती संख्या और परिणामस्वरूप घटते गोबर की मात्रा के कारण जैविक खेती पहले ही कठिन हो गई है। कचरे से कंपोस्ट का चलन अभी घर-घर अपनाया नहीं जा सका है। अतः गांधी जयंती पर स्वच्छता, सेहत, पर्यावरण, गो, गंगा और ग्राम रक्षा से लेकर आर्थिकी की रक्षा के चाहने वालों को पहला संदेश यही है कि गांवों में 'घर-घर शौचालय' की बजाय, 'घर-घर पानी निकासी गड्ढा' और 'घर-घर कंपोस्ट' के लक्ष्य पर काम करें।