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कर पाते कहाँ वे विकास ! - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
(मधुगीति १८०७२४) कर पाते कहाँ वे विकास, कर के कुछ प्रयास; वे लगाते रहे क़यास, बिना आत्म भास ! विश्वास कहाँ आश कहाँ, किए बिन सकाश;