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दक्खिन का दर्द - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
संजय चाणक्य ‘‘ तेरा मिजाज तो अनपढ़ के हाथों का खत है! नजर तो आता है मतलब कहां निकलता है!!’’ मेरी नानी बचपन में कहती थी कि दक्खिन की ओर मुह करके खाना मत