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आओ, अंधेरे से हम लड़ें - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
रात कितनी भी अंधेरी - घनी क्यों न हो रात कोख में छिपी होती है उजाले की किरण। कितना भी तुम क्यों न सताओ किसी को- अपने बच्चे को देख उभरती है तुम्हारे चेहरे