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बेज़ार मैं रोती रही, वो बे-इन्तेहाँ हँसता रहा - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
बेज़ार मैं रोती रही, वो बे-इन्तेहाँ हँसता रहा। वक़्त का हर एक कदम, राहे ज़ुल्म पर बढ़ता रहा। ये सोच के कि आँच से प्यार की पिघलेगा कभी, मैं मोमदिल कहती