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आज कोई जग ख़िताब ! - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
आज कोई जग ख़िताब, चह कहाँ हैं पा रहे; मन हमारे आज ख़्वाब, आ कहाँ हैं पा रहे ! जो भी कुछ गा पा रहे, मुक्त भव से आ रहे; अलूनी सी आत्म ध्वनि में, सलौनी