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एक गजल -सिगरेट की बदनसीबी - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
खुद को जलाकर,दूसरो की जिन्दगी जलाती हूँ मैं बुझ जाती है माचिस,जलकर राख हो जाती हूँ मैं पीकर फेक देते है रास्ते में,इस कदर सब मुझको चलते फिरते हर मुसाफिर