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हो मुक्त बुद्धि से, हुआ अनुरक्त आत्मा चल रहा ! - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम
हो मुक्त बुद्धि से, हुआ अनुरक्त आत्मा चल रहा; मैं युक्त हो संयुक्त पथ, परमात्म का रथ लख रहा ! मन को किए संयत नियत, नित प्रति नाता गढ़ रहा; चैतन्य की भव