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~ मरकज़-ए-जाँ…
किताबें चारों ओर और बीच में हूँ मैं, जैसे लहलहाते खेतों में इकलौता पेड़, जैसे तैरती पतंग तारों के बीचों बीच, गोल सब, किस तारें से हूँ दूर किसके करीब, दुनियाँ अजीबो-गरीब और बीच में हूँ मैं&#8…