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चेतना।
राख हूँ श्मशान की, भस्म हो कर भी, जल जाऊँगा। चेतन है अंतरात्मा जो मेरी, मिट कर भी, मिटा न मै पाऊँगा।। विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित। Chetana Rakh hu shamshan ki, bhasm ho kar bhi, jal jaunga. Chet…