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एक शहर ये भी – कविता 8 – दरगाह हज़रत निजामुद्दीन
एक ख़ुशनुमा सुबह ख़ींच लायी मुझे निज़ाम्मुद्दीन बस्ती की तंग गलियों में मन जा रुक गया महबूब – ए – इलाही की महकती चौखट पे और ग़म सब घुल गए खुसरो की मोहब्बत के मदवे में, इत्र और गुलाब से महकत…