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एक शहर ये भी – कविता 7 – रात आईना है …
रात आईना है इस शहर की बेख्वाब आँखों का शाम ढले जब धुप का आखरी उजाला पेड़ों की टहनियों में सिमट जाता हैं तो ये शहर किसी पेंटिंग की तरह रहस्मयी हो जाता है बची खुची रौशनी लैम्पोस्ट के नीचे सिमट …