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एक शहर ये भी – कविता 5 – महरौली
बचपन में दिल्ली रिज पे रत्ती बटोरा करते थे कॉलेज में दोस्तों का हाथ थामे किसी टूटी मुंडेर पे बैठे क़ुतुब मीनार को ताकते या आवारगी के आलम में युहीं फिरा करते, कीकर, बबूल,बिलाङ्गड़ा, पिल…