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सो रहे हैं वोह, जो किस्मत के भरोसे हैं |
सो रहे हैं वोह, जो किस्मत के भरोसे हैं | जग गए हैं वोह, जिन्हें कुछ करना है | सुबह का सूरज चढ़ता है, और दिन भर पिघलता है | उसके संघर्ष में काव्य है, वोह कर्म प्रज्वलित करता है | मैं भी उठता हूँ रोज़ …