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अक्सर झूठ सच का लिबास पहने आते है
हक़ीक़त रूठी परी है कबसे, फिर भी ख्वाब रिझाने आते है, है सब स्व में ही मगन फिर भी, वो मेरे है दिखाने आते है.. क्या कहूँ क्या लिखूं तुमसे, कि तुम्हें तो बस पढ़ने अक्षर आते है, पढो गर पढ़ सको भावों को, क…