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ऐसा कब सम्भव हो पाया है
मुस्कुराता रहा दिन भर, जो तुम फिर याद आयी थी, मालूम चला कि तप रहा हूँ बुखार में, जब हक़ीक़त पास आई थी.. थी तुम एक हसीन ख्वाब, जो मुझको मुझसे दूर ले गई, जीवन के कड़वे सच का, इस मूरख को ज्ञान दे गई। आज …