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काश दीवारों के भी जुबान होते
काश दीवारों के भी जुबान होते, फिर हम उस महफ़िल में न बदनाम होते, लोगों का दोष क्या कहे अब, जब भीष्म मजबूरी का रोना रोते रहे, और कौरव घिनौनी हरकतों पे हंसते रहे, शुक्र है कि कल द्रौपदी को बचाने आये भ…