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क्यूं मैं काफिर कहाता हूँ..
नहीं हूँ मैं नमाजी, न ही गिरिजा जाता हूँ, पर तुम्हारी ही मूरत बनाकर, हर रोज शीश झुकाता हूँ. फिर क्यूँ कहते है कुछ ख़ास बंदे, कि मैं गुनाह करता हूँ? हूँ मैं मुरख प्रेम-मत में, जो तुम्हें मिट्टी में ब…