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इन गलियों से गुज़रकर…
इन गलियों से गुज़रकर, गुजरे लम्हों से मिलता हूँ, दीदार-ए-हुस्न की खातिर, मै आज भी धडकता हूँ। शोर बहुत था इन गलियों में तब, आज पसरा बस सन्नाटा है, तब तू ही इनकी रौनक थी, तेरा आज भी इनको इन्तेजार है।…