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आवारी कलम !
न तेरी, न मेरी, न उसकी, है ये सबकी ‘ज़ुबान’. जब जब उठती है, जब जब चलती है, न देखती आये , न देखती बाए, बनके तूफ़ान सी बरसती है ! जो ताकत है नहीं पहलवानो मे, वो ताकत लेके लड़ती है ! कभी आशि…