resonner.wordpress.com
~ चाहत ~
तुम्हें चाहना तो मना था, और पाना जैसे ग़ुनाह । फ़िर, न चाह कर भी चाह लिया , न जाने ऐसा क्यों हुआ ! ज़िन्दगी इक ओर खींचती , और तुम खींचते इक ओर , बावली हो पड़ती मैं, कि बह जाऊँ किस छोर। तुमसे…