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रिम-झिम गिरे सावन. . . . . .
लत्ता मंगेशकर : रिम-झिम गिरे सावन, सुलग सुलग जाए मन भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन रिम-झिम गिरे सावन … पहले भी यूँ तो बरसे थे बादल, पहले भी यूँ तो भीगा था आंचल अब के बरस क्यूँ सजन, सुलग…