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Urmila ki Dasha - Madhusudan Singh
Click here to read part-1 सजी ऐसी अवध नगरी,की दुल्हन भी नहीं सजती, लखन,सिया,राम आये हैं,ख़ुशी कहते नहीं बनती। सजा आकाश तारों से, सजी वैसी अवध नगरी, ख़ुशी से झूमते सारे, ख़ुशी कहते नहीं बनती, वहीं ऐसा भी एक कोना, बिरह की आग में जलती, बनी पत्थर सी एक मूरत, किसी की राह है तकती …