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Sangam - Madhusudan Singh
तू चंदन लेप लगाती है, मैं माटी तिलक लगाता हूँ, धरती पर तेरे पांव कहा, मैं बिस्तर धरा बनाता हूँ, महलों की है तू चकाचौंध, झोपड़पट्टी का शान प्रिये, तेरा मेरा फिर मेल कहां, तू जन्नत मैं श्मशान प्रिये। तू भी इस माटी से निकली, जिस माटी से हम निकले हैं, कल की बाते कुछ …