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Mahatvkanksha/महत्वकांक्षा - Madhusudan Singh
मानव करता उत्तपात मगर, चट्टान पिघलते देखा है, होते हैं जब इंसान दुखी,तब मेघ बरसते देखा है| जलचर,नभचर संग जीव सभी, मानव का साथ निभाते हैं, पर खेद हमें अपनों पर है, जो इनको रोज मिटाते हैं, नदियां कहती आ पास मेरे, मीठे जल तुझे पिलाऊंगी, गैया कहती आ पास मेरे, मैं तुझमें यौवन लाऊंगी, …