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Kisan ki Majburi/किसान की मजबूरी - Madhusudan Singh
Image Credit :Google टुकड़ों में खलिहान बंटा है खुशियाँ उनसे दूर लिखूँ हालत कैसी, छोड़ किसानी बन बैठे मजदूर, लिखूँ हालत कैसी। ख्वाब लिए ही सोते,जगते,ख्वाबों में ही पलते हैं, यौवन जल जाती है सपने कहाँ हकीकत बनते हैं, हो गई रोटी भी थाली से अब दूर,लिखूँ हालत कैसी, छोड़ किसानी बन बैठे मजदूर, लिखूँ …