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GULAAB AUR HUM/गुलाब और हम - Madhusudan Singh
Image Credit : Google काँटों पर पले गुलाब और हम भी, टूटे वे और हम भी। कभी बालों में,कभी हाथों में, कभी हार बन,कभी प्यार बन, यहाँ-वहाँ,जहाँ-तहाँ कहाँ नहीं सजे हैं गुलाब और हम भी, फिर किसी चौराहे पर,बिखरे वे और हम भी। एक खुश दूजा डाल पर खिले थे, नजरों में दोनों सबके चढ़े …