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Dustak - Madhusudan Singh
बिखर कर भी प्रेम बिखर नहीं पाता है, संवर कर भी स्वार्थ संवर नहीं पाता है, खुशबु बिखेरे मिटकर फूल दुनिया में, कांटे फूल पाकर भी महक नहीं पाता है, बिखर कर भी प्रेम बिखर नहीं पाता है। जिंदगी तो दौड़ है स्वार्थ और प्रेम का, रिसते हैं आँखों से अश्क स्वार्थ-प्रेम का, सिलवटें निशान …