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DUDH KA DAANT/दूध का दाँत - Madhusudan Singh
Image credit : Google जब तक दूध के दाँत थे मुख में फर्क नहीं जाना, ऊँच-नीच क्या जाति-धर्म सब अब है पहचाना। आज समझ में आया बचपन, में ही दुनियाँ सारी थी, छोटा सा खलिहान खेल की, जन्नत,जान हमारी थी, असलम,मुन्ना,कलुआ,अंजू, मंजू सखा हमारी थी, बिन बैठे एक साथ चैन ना, रातें भी अंधियारी थी, …