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Antarkalah - Madhusudan Singh
क्या क्या सहा ये वतन हँसते-हँसते, किसे ये दिखाये जखम हँसते-हँसते। जिगर में जिसे अपना इसने बसाया, माथे की बिंदिया जिसे था बनाया, कभी नाज़ करती जहाँ,जिसके बल पर, उसी ने उजाड़े खुशी इस चमन के किसे ये दिखाये जखम हँसते-हँसते। सदियों से देखी कई सभ्यताएँ, ढली ये स्वयं जैसा हमने बनाये, कई सरहदों में …