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ANMOL/अनमोल - Madhusudan Singh
कुछ फटे,कुछ सटे, कुछ शब्द पन्नों के स्याही में लिपटे वर्षों से दराज में पड़े,ये चंद चिट्ठियों के टुकड़े, किसी के लिए तुक्ष होंगे, मगर किसी के लिए जान से भी प्यारे थे,ये चंद रद्दी के टुकड़े, वो जब भी दराज खोलती, एक नजर उन टुकड़ों को देखती, लाख मनाती मगर, बिन पढ़े ही अश्क …