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Jindgi/जिंदगी - Madhusudan Singh
कलकल बहता पानी, स्थिर मोह लिया मन मेरा, सुदबुध खो बैठे, थे तुम बहते पानी जैसे, तेरे हो बैठे।। कल तक हम थे बृक्ष सामान, फिर भी भरा हुआ अभिमान, कितने आँधी बनकर आये, फिर भी हमें डिगा ना पाये, हम थे जड़वत सील के जैसे, विश्वामित्र भी कह लो वैसे, फिर तूँ पास मेनका …