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एक मजदूरन!
कर्म में अरुणोदय से लीन । वस्त्र धारें हैं जीर्ण, मलीन । बदन उसका है आभाहीन । क्षुधा की पूर्ति मात्र है धर्म । न जाने दर्प न माने शर्म । तनिक प्रारब्ध, कठिन है कर्म । नही कोई है अपना ठौर । बनेगा…