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चाँदनी जी लो – अज्ञेय
शरद चाँदनी बरसी अंजुरी भर कर पी लो ऊँघ रहे हैं तारे सिहरी सिरसी ओ प्रिय कुमुद ताकते अनझिप क्षण में तुम भी जी लो! सींच रही है ओस हमारे गाने घने कुहासे में झिपते चेहरे पहचाने खम्भों पर बत्तियाँ खड़ी …